बदलती जीवनशैली ने न सिर्फ लोगों के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है, बल्कि मानसिक रोगियों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। मानसिक रोगियों को शारीरिक रोगियों के मुकाबले ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन होता इसके उलट है। कई बार तो लोगों का व्यवहार मानसिक रोगियों के लिए ज्यादा असहनीय हो जाता है। इसीलिए मानसिक रोगों के लक्षण नजर आने पर भी कई लोग उस बारे में खुलकर बात नहीं करते और डॉक्टर के पास जाने से भी कतराते हैं। इससे रोग और बढ़ जाता है। पूरे विश्व में तेजी से बढ़ती मानसिक रोगियों की संख्या को देखते हुए इनके प्रति जागरूकता बहुत जरूरी है।
क्या हैं इनके कारण
आनुवांशिक कारणों के अलावा सामाजिक और पर्यावरणीय कारक भी मानसिक स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जो माता-पिता महत्वाकांक्षा के कारण अपने बच्चों को वक्त नहीं दे पाते या जो बच्चे गरीबी में पले-बढ़े होते हैं या जिनकी मां बचपन में मर जाती हैं या पिता शराब पीकर बच्चों की पिटाई करते हैं, ऐसे बच्चों के बड़े होकर मानसिक रोगी होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। सिर में लगी चोट, संक्रमण, तनाव और अनिद्रा भी व्यक्ति को मानसिक रोगी बना सकती है। लंबे समय तक तनाव में रहने से भी मास्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है।
डिप्रेशन
महानगरों में डिप्रेशन यानी अवसाद से पीड़ित लोगों की संख्या 15-17 प्रतिशत है। आमतौर पर यह बीमारी 13 से 35 वर्ष की उम्र में देखने को अधिक मिल रही है। लोग पूरी नींद नहीं ले पाते। तेज रफ्तार जिंदगी में मस्तिष्क को पूरा आराम नहीं मिल पाता। तनाव के कारण शरीर में कई हारमोनों का स्तर बढ़ता जाता है जिन्हें एड्रिनलीन और काट्रिसोल प्रमुख हैं। इनकी वजह से दिल का तेजी से धड़कना, पाचन-क्रिया का मंद पड़ जाता, रक्त का प्रवाह प्रभावित होना, नर्वस सिस्टम की क्रिया प्रणाली में गड़बड़ी और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने जैसी समस्याएं हो जाती हैं। यह स्थिति कुछ समय तक लगातार बने रहने से अवसाद की स्थिति पैदा हो जाती है।
डिमेंशिया
यह भूलने की बीमारी है जो लगातार गंभीर होती जाती है। व्यक्ति नाम और जगहों को भी भूलने लगता है। ऐसे व्यक्ति में भाषा और ध्यान केंन्द्रित न कर पाने की समस्याएं भी देख जाती हैं। इसमें मस्तिष्क का वह भाग नष्ट हो जाता है, जो भावनाओं पर नियंत्रण रखता है। इसलिए व्यक्ति मूडी हो जाता है। तनाव, पोषक भोजन की कमी आदि इसके प्रमुख कारण हैं।
पार्किसन
डोपामिन रसायन हमारे मस्तिष्क की विभिन्न तंत्रिकाओं के बीच संदेशवाहक का काम करता है। जब डोपामिन का निर्माण करने वाली कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं तो पार्किसन के लक्षण प्रकट होते हैं। डोपामिन हमारे शरीर की गति को नियंत्रित रखता है। इस लिए इसकी कमी से हाथ-पैरों में कंपकपी, शरीर का संतुलन बिगड़ना, मांसपेशियों का कड़क हो जाना तथा अत्यधिक थकान रहना आम बात हो जाती है। बाद में मरीज डिप्रेशन में चला जाता है।
सिजोफ्रेनिया
यह एक जटिल मानसिक रोग है। इसमें रोगी कल्पनाओं में जीने लगता है। इसमें रोगी के लिए वास्तविक और अवास्तविक चीजों में भेद करना मुश्किल हो जाता है। कई मरीजों को अजीब तरह की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। वह कई तरह के भ्रम में जीने लगता है। इसका मुख्य कारण एकाकीपन, बेरोजगारी, गरीबी, नशीली दवाओं का सेवन है। बच्चे की अधिक पिटाई भी आगे चलकर इसका कारण बन सकती है।
अल्जाइमर
यह एक घातक मानसिक रोग है। इसमें मस्तिष्क की कोशिकाओं का आपस में संपर्क खत्म हो जाता है। परिणामस्वरूप मास्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती है। यह 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पाया जाने वाला सामान्य मस्तिष्क रोग है।
मेनिया
मेनिया अर्थात उन्माद रोग एक गंभीर मनोरोग है। इसमें रोगी अत्यंत उत्तेजक और हिंसक हो जाता है। यह एक खतरनाक मानसिक अवस्था है। व्यक्ति उत्तेजित हो जाता है तो वास्तविकता से संपर्क टूट जाता है।
एंजाइटी
अत्यधिक चिंता, बेचैनी, भविष्य का डर आदि इसका प्रमुख कारण हो सकता है। इससे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसमें थकान, सिरदर्द और अनिद्रा रहती है।
क्या है उपचार
हमारे देश में मानसिक रोग के प्रति जागरूकता का अभाव है। 90 प्रतिशत रोगी तो उपचार के लिए कभी हॉस्पिटल भी नहीं जाते। कई मामलों में यदि रोग का पता चल भी जाता है तो मरीज और उसके परिवार वाले खामोशी से सहते रहते हैं। कहां से सहायता प्राप्त की जाए, वे यह भी नहीं जानते। अगर मरीज को सही समय पर उचित इलाज उपलब्ध कराया जाए तो कई मानसिक रोगों का पूरी तरह इलाज संभव है।
फार्मेकोथेरेपी
दवाओं से किसी मानसिक रोग के उपचार को फार्मेकोथेरेपी कहते हैं। कई आधुनिक दवाएं बहुत अच्छी हैं, जिनसे मस्तिष्क को स्वस्थ कर रोगी का इलाज किया जाता है।
साइकोथेरेपी
सामान्यत: साइकोथेरेपी का उपयोग मानसिक रोगों या भावनात्मक आघातों के लिए किया जाता है। इसमें मरीज से विस्तार से बातचीत कर उसकी मानसिक अवस्था का अध्ययन किया जाता है और रोग के कारणों का पता लगाया जाता है। इस थेरेपी के द्वारा रोगी को परिस्थितियों से तालमेल बिठाने और खुद को स्वीकार करने में मदद की जाती है।
बिहैवियर थेरेपी
यह बिहैवियर डिसऑर्डर को ठीक करने की पद्धति है। यह अवसाद, उत्तेजना, भय आदि में सहायक हो सकती है।
संतुलित भोजन खाएं
जिस तरह शरीर को पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मस्तिष्क को भी पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, वसा मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी हैं। दिन में तीन बार भरपूर भोजन की बजाए 5 या छह बार थोड़ा-थोड़ा खाएं। इससे रक्त में शर्करा का स्तर कम नहीं होता। शराब का सेवन न करें या कम से कम करें।
भरपूर सोएं
नींद की कमी से मस्तिष्क अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाता। इससे सोचने की क्षमता, सृजनशीलता और समस्याओं को हल करने की क्षमता कम होती है। अनिद्रा के कारण अवसाद, एंजाइटी जैसे मानसिक रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
शारीरिक रूप से फिट रहें
शारीरिक रूप से सक्रिय रहें। नियमित रूप से व्यायाम करें। व्यायाम करने से मस्तिष्क में रक्त का संचरण बढ़ता है, जिससे मस्तिष्क की कार्यक्षमता भी बढ़ती है।
मस्तिष्क का उपयोग करें
नए शोधों ने यह साबित किया है कि मस्तिष्क भी मांसपेशियों के समान ही कार्य करता है। जितना ज्यादा आप इसका इस्तेमाल करेंगे, उतना ही यह शक्तिशाली होगा। मानसिक व्यायाम नई मस्तिष्क कोशिकाओं के निर्माण में मदद कर याददाश्त बढ़ाता है। नई जटिल चीजें सीखें। जैसे कोई नई भाषा, चुनौतीपूर्ण खेल जैसे शतरंज आदि खेलें। सुडोकू, क्रॉस वर्ड आदि बेहतरीन मानसिक व्यायाम हैं।
तनाव न लें
तनाव मस्तिष्क का सबसे बड़ा शत्रु है। अगर समय रहते इसको नियंत्रित न किया गया तो लगातार तनाव की स्थिति मस्तिष्क की कोशिकाओं और हिप्पोकैंपस को नष्ट कर देगी। हिप्पोकैंपस मस्तिष्क का वह क्षेत्र है जो नई यादों को बनाने और पुरानी यादों को संजोकर रखने का काम करता है। इसके नष्ट होने से डिमेंशिया होने की आशंका बढ़ जाती है।
भरपूर पानी पिएं
हमारे शरीर में करीब 80 प्रतिशत पानी होता है। डिहाइड्रेशन हमारी मानसिक ऊर्जा और क्षमता को कम करता है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी रोजाना कम-से-कम 4 लीटर पानी का सेवन बहुत जरूरी है।
योग और ध्यान करें
योग मेटाबॉलिक रेट को बढ़ाता है, रक्त को शुद्ध करता है और रक्त संचरण को तेज करता है। ये सारी चीजें मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में काफी सहायक होती हैं। मानसिक शांति के लिए ध्यान करें। वैज्ञानिकों ने भी साबित किया है कि अवसाद, उत्तेजना, अनिद्रा में बहुत उपयोगी है ध्यान। ध्यान सेरेब्रल कोरटेक्स की मोटाई बढ़ाता है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संपर्को को बढ़ता है, जिससे स्मृति तेज
मानसिक रोग के आम लक्षण
-मन उदास रहना, कुछ भी अच्छा नहीं लगना, बात-बात में गुस्सा होना।
-अंदर ही अंदर घुटन महसूस करना, आत्मविश्वास का समाप्त हो जाना, याददास्त की कमी, तेज दिमाग का मद्धिम होना, भूख एवं नींद में कमी।
-बहुत ज्यादा उत्तेजित होना, बहुत ज्यादा खुश होना, लगातार बोलते रहना, ज्यादा खर्च करना।
-असामान्य व्यवहार करना, ज्यादा शक करना, सशंकित रहना, कान में काल्पनिक आवाज सुनाई देना।
-भीड़-भाड़ वाले स्थान जैसे बस, बाजार में अकेले जाना।
-बार-बार हाथ धोना, बार-बार बंद ताले की जांच करना।
– शराब, तंबाकू चाह कर भी नहीं छोड़ पाना।
-बच्चों का जरुरत से ज्यादा चंचल होना, स्थिर रहकर पढ़ाई या अन्य काम नहीं कर पाना एवं आवेश में आकर कार्यो को करना।
इसके लिए आयुर्वेद चिकित्सा भी लाभकारी हैं। चिकित्स्कीय परामर्श लेना जरुरी हैं।