जिसमें आमजन को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की सुरक्षा के लिए एससी-एसटी एक्ट के संबंध में जानकारी प्रदान कि गई.
दुर्ग। राजेश श्रीवास्तव जिला एवं सत्र न्यायाधीश/अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण-दुर्ग के मार्गदर्शन एवं निर्देशन में विश्व आदिवासी दिवस दुर्ग जिले के विभिन्न स्थानों में मनाया गया जिसमें आमजन को नालसा की (आदिवासियों के अधिकारों का संरक्षण और परिवर्तन के लिए विधिक सेवाएं) योजना 2015 एवं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की सुरक्षा के लिए एससी-एसटी एक्ट के संबंध में जानकारी प्रदान करने हेतु विधिक जागरूकता शिविर आयोजित किया गया।
राहूल शर्मा सचिव जिला विधिक सेवा प्राधिरण/व्यवहारी न्यायाधीश ने ग्राम पुरई मे उपस्थित होकर बताया कि विश्व आदिवासी दिवस आदिवासियों के मूलभूत अधिकारों की सामाजिक आर्थिक और न्यायिक सुरक्षा के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है। आदिवासी शब्द दो शब्दों ‘आदि और वासी’ से मिल कर बना है जिसका अर्थ मूल निवासी होता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की सुरक्षा के लिए एससी-एसटी एक्ट पूरे देश में 30 जनवरी 1990 को लागू कर दिया गया। इसका उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा मुहैया कराना है तथा इनके खिलाफ समाज में फैले भेदभाव और अत्याचार को रोकना है। इस एक्ट का मकसद एससी-एसटी वर्ग के लोगों को अन्य वर्गों की ही तरह समान अधिकार दिलाना भी है। अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के साथ होने वाले अपराधों की सूरत में इस एक्ट में सुनवाई का विशेष प्रावधान किया गया है। इसके तहत इस समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव या अन्याय करने वाले लोगों को कठिन सजा का भी प्रावधान है। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारणद्ध अधिनियम 1989 के अनुसार उत्पीड़ित अनुसूचित जातिध्जनजाति के व्यक्तियों को विभिन्न प्रकार के उत्पीड़न की घटनाओं में आर्थिक सहायता विभिन्न चरणों में दिये जाने का प्रावधान है। अनुसूचित जाति के उत्पीड़ित व्यक्ति द्वारा एफआईआर दर्ज करने पर विभाग द्वारा प्रथम चरण में लाभार्थी को त्वरित आर्थिक सहायता पहुचाने का प्रावधान किया गया है। यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता हैं जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नही हैं तथा वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता हैं। इस एक्ट के तहत मामलों में जांच और सुनवाई के दौरान पीड़ितों और गवाहों की यात्रा और जरूरतों का खर्च सरकार की तरफ से उठाया जाएगा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भी भेदभाव नहीं की जा सकती। भारत के संविधान में पांचवी अनुसूची के जरिये आदिवासी क्षेत्रों (अनुसूचित क्षेत्रों) के तहत एक ऐसी व्यवस्था बनाने की पहल की गई, जिनसे आदिवासी/आदिम जनजाति समुदायों के साथ होते रहे अन्याय और उपेक्षा को खत्म किया जा सके और उनकी अस्मिता की सुरक्षा के साथ वे अपनी व्यवस्थाएं भी बरकरार रख सकें। इसके तहत आदिम जनजाति मंत्रणा परिषद के गठन की व्यवस्था की गई है। वास्तव में भारत के संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची आदिवासी/आदिम जाति समुदाय की अस्मिता की सुरक्षा करते हुए भारत के समाज का एक अभिन्न अंग बनाने के मकसद से लागू की गई थी। यह एक स्थापित तथ्य है कि आदिम जाति समुदाय प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहता है, अतः यह जरूरी रहा कि आदिम जातियों के निवास स्थान/रहवास वाले स्थानों के संसाधनों को अन्य क्षेत्रों के समुदायों के अतिक्रमण या उनके व्यावसायिक दखल से संरक्षित किया जाए। आज भी यह बहुत बड़ी जरूरत है।