जन शिक्षण संस्थान रायपुर ने 2 जून को आठवां अंतरराष्ट्रीय योगा दिवस का आयोजन अपने प्रशिक्षण केंद्र बैरन बाजार सामुदायिक भवन में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में नगर निगम रायपुर के अध्यक्ष के प्रतिनिधि बाकर अब्बास जी उपस्थित हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता निदेशक श्री अतुल सिंह ने की। विशेष अतिथि के रुप में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की उपाध्यक्ष श्रीमती नम्रता यदु उपस्थित रही। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए जन शिक्षण संस्थान के सभी रिसोर्स पर्सन पूर्वा प्रशिक्षणार्थी एवं क्षेत्र के गणमान्य नागरिक भी उपस्थित हुए।
इस कार्यक्रम में राहुल योगपीठ रायपुर के वरिष्ठ युवा प्रशिक्षक श्री लोकेश वर्मा जी के मार्गदर्शन में विभिन्न योगा आसनों का प्रशिक्षण उपस्थित अतिथियों, जन शिक्षण संस्थान के अधिकारियों एवं कर्मचारियों प्रशिक्षणार्थियों एवं उपस्थित गणमान्य नागरिकों को दिया। उन्होंने योगा में विभिन्न आसनों, प्राणायाम एवं मेडिटेशन का महत्व बताया साथ ही उन्होंने कहा कि आसनों के नियमित अभ्यास से रीढ़ में लोच बढ़ जाती है मांसपेशियां ठीक हो जाती है रक्त का प्रवाह उपयुक्त मात्रा में होने लगता है और नाड़ी तंत्र सशक्त हो जाता है।
मुख्य अतिथि श्री बाकर अब्बास ने कहा कि निश्चित ही योग पूरी दुनिया में स्वास्थ्य को चुनौती देने वाली बीमारियों को कम करने में मदद करता है यह प्रैक्टिस है जो लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है साथ ही ध्यान का अभ्यास करने में मदद करता है और तनाव से राहत दिलाता है योग स्वास्थ्य की सुरक्षा और स्वास्थ्य विकास के बीच एक कड़ी प्रदान करता है इसलिए हमें नियमित रूप से योग का अभ्यास करना चाहिए और इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।
जन शिक्षण संस्थान रायपुर के निदेशक श्री अतुल सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि योग मानव के शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है यह एक अमूल्य प्राचीन प्रथा है यूं तो योग की महत्व किसी से छुपा नहीं है लेकिन इसका महत्व तक बढ़ गया जब कोरोना के कारण सभी घर में बैठकर तनाव से ग्रस्त हो गए थे और लोगों की आवाजाही बंद हो गई थी ऐसे में मन को शांत रखने और शरीर को दुरुस्त रखने के लिए योग ने ही मदद की थी।
विशेष अतिथि के रुप में उपस्थित हुई श्रीमती नम्रता यादव ने कहा कि योग का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को स्वयं से ऊंचा उठाकर ज्ञानोदय की उच्चतम अवस्था प्राप्त करने में मदद करना है जैसे कि भगवत गीता में कहा गया है कि व्यक्ति स्वयं से सहयोग करके मन को पूरी तरह से अनुशासित कर सभी इच्छाओं से स्वतंत्र होकर, केवल स्वयं में लीन हो जाता है तभी उसे योगी माना जाता है